दिन चड़े यहाँ रिश्वत ले कर, हर शाम यहाँ घोटाला है,
हर शाख पे उल्लू बैठा है , फिर कैसे कहूँ उजाला है |
ऊँचा लिबास बे-शक्क इनका ,
पर सोच - समझ सब बौनी है |
अख़बार हमें बतलाते हैं ,
इनकी हर चाल घिनौनी है |
प्रजा की तो अब बात कहाँ ,
पशुओं का हजम निवाला है||
हर शाख ...................||
एक बार जनता से वोट मांग ,
जा कर कुर्सी को थाम लिया|
जो बना बागबाँ भारत का ,
उसने ही मुल्ख नीलम किया |
ऊँचे पद पे मामा उसका ,
साले का पद भी आला है ||
हर शाख ...............||
गुंडा -गर्दी का राज यहाँ,
इनके सुन्योजत दंगे हैं |
हेरा- फेरी रिश्वत -खोरी ,
यहाँ सब हमाम में नंगे हैं|
जहाँ दाल ही पूरी काली हो ,
क्यों कहूँ दाल मैं काला है ||
गुरमुख सिंह "सैनी"
हरे नोटों से भरते घर, कहते निकला दिवाला है
ReplyDeleteऐसे लोगों के ही चलते, जगह-जगह घोटाला है
रतन चंद 'रत्नेश'